मुझे एक स्ट्रीट लाइट की तलाश है!! चैंकिये नहीं, अभी मैं पागल नहीं हुआ हूँ जो मुझे दिल्ली की सड़कों पर लगे स्ट्रीट लाइट्स नजर नहीं आतीं। मैं इन मामूली स्ट्रीट लाइट्स की बात नहीं कर रहा हूँ। दरअसल मैं तलाश रहा हूँ वो विशेष स्ट्रीट लाइट, जिसके नीचे बैठकर पढ़े हुए लोग आज बड़े-बड़े नेता, अभिनेता और जानी-मानी हस्तियां बनी हुई हैं।

आप किसी भी बड़ी मशहूर हस्ती के इन्टरव्यू में ये बातें कॉमन पाएंगे कि उनका परिवार बहुत ही गरीब था, वो मुश्किल से दो वक्त की रोटी खा पाते थे और उन्होंने स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर अपनी पढ़ाई पूरी की.... वगैरह। अक्सर ये बातें बड़े नेता अपने इन्टरव्यू या भाषण में जरूर कहते पाए
जाते हैं। सुनने या पढ़ने वाले लोग ये करूणामयी गाथा सुनकर भावुक हो जाते हैं। हालांकि ये नेतागण इसके आगे की हिस्ट्री बताने की ज़हमत कभी नहीं उठाते कि इसके बाद उन्होंने कैसे पाँच सालों में ही करोड़ों रूपये, कई सौ एकड़ जमीनें, कई कोठियां , बंगले कैसे बनाए।
जाते हैं। सुनने या पढ़ने वाले लोग ये करूणामयी गाथा सुनकर भावुक हो जाते हैं। हालांकि ये नेतागण इसके आगे की हिस्ट्री बताने की ज़हमत कभी नहीं उठाते कि इसके बाद उन्होंने कैसे पाँच सालों में ही करोड़ों रूपये, कई सौ एकड़ जमीनें, कई कोठियां , बंगले कैसे बनाए।मैं सोचता हूँ कि इस सारी माया में सारा चमत्कार उस स्ट्रीट लाइट का ही है जिसके नीचे बैठकर नेताजी ने पढ़ाई की। हो सकता है कि ऐसी स्ट्रीट लाइट का नामकरण भी होना शुरू हो जाए। जिस स्ट्रीट लाइट के नीचे जो भी पढ़कर ‘‘बड़ा आदमी’’ बन गया हो, उसके नाम पर स्ट्रीट लाइट का नाम कर दिया जाए। जरा सोचिए कि वो स्ट्रीट लाइट हमें कहीं मिल जाए तो हम तो उसके नीचे बैठकर पढ़ने के लिए आपस में धक्का-मुक्की भी करने को तैयार हो जाएंगे। ये भी हो सकता है कि उसके नीचे बैठ कर पढ़ने के लिए आरक्षण का भी पैंतरा आजमाया जाए कि फलां जाति के लोगों के लिए दिन का 8 घंटा पढ़ने के लिए तो ऊॅंची जाति के लिए मुश्किल से 2 घंटे। अल्पसंख्यक वर्ग के लिए भी 6 घंटे की सिफारिश की जा सकती है।
आप भी सोच रहे होंगे कि मैं भी कहाँ ख्याली पुलाव बनाने बैठ गया। पर हकीकत यही है कि इस स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पढ़ने की कहानी के पीछे काफी झोल है। एकाध उदाहरण अपवाद स्वरूप माने जा सकते हैं परंतु अगर आप आजादी के बाद के नेताओं के भाषणों पर नजर डालें तो ये स्ट्रीट लाइट वाली आपको हर बार एक नये स्वरूप में मिल जाएगी। हालांकि उस स्ट्रीट लाइट ने नीचे उनके पढ़े जाने का खामियाजा देश की आम जनता को ही भुगतना पड़ता है। क्योंकि जैसे ही वो स्ट्रीट लाइट का मोह त्याग ‘‘बड़े आदमी’’ बनते हैं, वैसे ही वो उस समय की गुरबत का खामियाजा आम जनता और देश से वसूलने लगते हैं और कुछ ही सालों में इतने ‘‘बड़े आदमी’’ बन जाते हैं कि वो ‘‘स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पढ़ने वाला इंसान’’ कहीं अंधेरों में गुम हो जाता है............................!!




अमजद जी आपने तो एक सही बात लिखी जो नेताओ के ऊपर एकदम फिट बैठती है. लगे रहो मैं उम्मीद करता हूँ की आगे भी ऐसे लेख मिलते रहेंगे. आपने मजाक में ही जनता को जागरूक किया है.
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